पिंडदान करने से पितरों को स्वर्ग की प्राप्ति होती है तथा वे अपने वंशजों को आशीर्वाद प्रदान करते हैं
डॉ उमाशंकर मिश्रा,लखनऊ : आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की दशमी तिथि, जिसे दशमी श्राद्ध कहा जाता है, आज दिनांक 16 सितंबर 2025, मंगलवार को मनाई जा रही है। पितृ पक्ष के अंतर्गत आने वाली यह तिथि उन पितरों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है, जिनका निधन दशमी तिथि को हुआ हो। पारंपरिक मान्यताओं के अनुसार, दशमी के दिन श्राद्धकर्म और पिंडदान करने से पितरों को स्वर्ग की प्राप्ति होती है तथा वे अपने वंशजों को आशीर्वाद प्रदान करते हैं।
गया कूप पर पिंडदान का विशेष महत्व
धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, दशमी श्राद्ध का कर्म गया सिर और गया कूप नामक वेदियों पर करने का विधान बताया गया है। इन पवित्र स्थानों पर पिंडदान करने से उन पितरों को स्वर्गलोक की प्राप्ति होती है जो किसी कारणवश अभी तक कष्ट में हैं। मान्यता है कि दशमी तिथि पर गया कूप में पिंडदान करने से अश्वमेघ यज्ञ के बराबर फल प्राप्त होता है। दशमी के श्राद्ध के उपरांत संकटा देवी के दर्शन एवं पूजन से विशेष पुण्य लाभ मिलता है।
दशमी श्राद्ध की विधि
- प्रातः स्नान के बाद पूजा स्थान को स्वच्छ करके वहां पूर्वजों की तस्वीर या प्रतीक स्थापित करें।
- गंगाजल से शुद्धिकरण करें एवं भगवान विष्णु की पूजा के साथ पितरों का स्मरण करें।
- पितरों से अनजाने में हुई भूल के लिए क्षमा याचना करें एवं परिवार की सुख-शांति हेतु आशीर्वाद की प्रार्थना करें।
- गाय का दूध, दही, घी और खीर अग्नि में अर्पित करें।
- पितरों के लिए बनाए गए भोजन में से चार ग्रास निकालें:
- पहला ग्रास गाय के लिए,
- दूसरा कुत्ते के लिए,
- तीसरा कौए के लिए,
- और चौथा अतिथि या मान्य व्यक्ति के लिए।
- अंत में ब्राह्मण को भोजन एवं दान देकर विधिवत पूजन सम्पन्न करें।























