महंगे कच्चे तेल से महंगाई, सकल घरेलू उत्पाद ग्रोथ और शेयर बाजार पर असर की आशंका
नई दिल्ली : मिडिल ईस्ट में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव का असर अब भारत की अर्थव्यवस्था पर भी दिखाई देने लगा है। कच्चे तेल की कीमतें लगातार 100 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर बनी हुई हैं, जिससे महंगाई, आयात बिल, सकल घरेलू उत्पाद ग्रोथ और शेयर बाजार पर दबाव बढ़ने की आशंका जताई जा रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि चिंता सिर्फ पेट्रोल-डीजल की बढ़ती कीमतों तक सीमित नहीं है, बल्कि अमेरिका और ईरान के बीच जारी तनाव लंबा खिंचने की स्थिति में भारत की आर्थिक रफ्तार भी प्रभावित हो सकती है। खास तौर पर हॉर्मुज स्ट्रेट के जरिए दुनिया के बड़े हिस्से में तेल और LPG की सप्लाई होती है। ऐसे में वहां किसी भी प्रकार की बाधा वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए बड़ा खतरा मानी जा रही है।
विदेशी मुद्रा भंडार से फिलहाल राहत
अर्थशास्त्रियों के अनुसार भारत अभी तक अपने मजबूत विदेशी मुद्रा भंडार और विभिन्न देशों से तेल आयात की रणनीति के कारण स्थिति को संभाले हुए है। हालांकि, लंबे समय तक ऊंचे दाम बने रहने पर इसका असर गहरा हो सकता है। देबोपम चौधरी के मुताबिक ऊर्जा कीमतों में तेजी और सप्लाई बाधाओं ने वित्त वर्ष की शुरुआत में ही आर्थिक गतिविधियों पर दबाव बढ़ा दिया है। सरकारी आंकड़ों में लगातार दो महीनों से LPG खपत में गिरावट दर्ज की गई है, जबकि एविएशन टर्बाइन फ्यूल (ATF) की मांग में भी कमजोरी के संकेत मिले हैं।
GDP ग्रोथ पर असर की आशंका
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि हॉर्मुज स्ट्रेट लंबे समय तक प्रभावित रहता है, तो भारत की GDP ग्रोथ में 0.25 से 0.35 प्रतिशत तक की कमी आ सकती है। भारतीय रिजर्व बैंक ने वित्त वर्ष 2026-27 के लिए 6.9 प्रतिशत GDP ग्रोथ का अनुमान जताया है। वहीं कई वैश्विक एजेंसियों ने इससे कम वृद्धि दर का अनुमान लगाया है। United Nations ने भारत की विकास दर 6.4 प्रतिशत रहने का अनुमान दिया है। वहीं UBS ने इसे घटाकर 6.2 प्रतिशत कर दिया है। चार्टर्ड मानक ने भी अपना अनुमान 7.1 प्रतिशत से घटाकर 6.4 प्रतिशत कर दिया है।
आयात बिल पर बढ़ेगा बोझ
जानकारों के मुताबिक कच्चे तेल की कीमतों में हर 10 डॉलर प्रति बैरल की वृद्धि भारत के आयात बिल पर लगभग 13 से 14 अरब डॉलर का अतिरिक्त बोझ डालती है। युद्ध से पहले भारत लगभग 65 डॉलर प्रति बैरल के हिसाब से तेल खरीद रहा था, जबकि अब कीमतें 100 डॉलर के आसपास पहुंच चुकी हैं।
शेयर बाजार में उतार-चढ़ाव जारी रहने की संभावना
Vineet Bolinjkar का कहना है कि मौजूदा वित्त वर्ष में शेयर बाजार से बहुत अधिक रिटर्न की उम्मीद नहीं करनी चाहिए। आयात और ब्याज दरों पर निर्भर सेक्टर्स में अधिक उतार-चढ़ाव देखने को मिल सकता है। वहीं Apoorv Sheth का मानना है कि असली खतरा सिर्फ महंगा तेल नहीं, बल्कि उसके बाद बढ़ने वाली महंगाई, कंपनियों की लागत और उपभोक्ता खर्च में गिरावट है। उनके अनुसार मिडिल ईस्ट में हालात सामान्य होने तक कच्चे तेल की कीमतों में भारी उतार-चढ़ाव बना रह सकता है। हालांकि World Bank ने उम्मीद जताई है कि तमाम वैश्विक चुनौतियों के बावजूद भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल बना रहेगा।
























