जातीय जनगणना और सामाजिक न्याय को राहुल गांधी ने बनाया मुख्य हथियार
लखनऊ: उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव की राजनीतिक बिसात बिछनी शुरू हो गई है। सूबे में भारतीय जनता पार्टी (BJP), समाजवादी पार्टी (SP) और कांग्रेस के बीच सियासी हलचल चरम पर है। जहाँ मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पूरी तरह चुनावी मोड में आ चुके हैं, वहीं लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी और सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने भी अपनी जमीनी सक्रियता बढ़ा दी है। इन सबके बीच कांग्रेस की नई सोशल इंजीनियरिंग ने राज्य के सियासी गलियारों में एक नई बहस छेड़ दी है।
रणनीति के केंद्र में ‘अत्यंत पिछड़ा वर्ग’ (EBC)
यूपी विधानसभा चुनाव में अब एक साल से भी कम का समय बचा है। इसे देखते हुए कांग्रेस ने अपना पूरा ध्यान ‘अत्यंत पिछड़ा वर्ग’ (EBC) वोट बैंक पर केंद्रित कर दिया है।
- अमेठी-रायबरेली से संदेश: हाल ही में राहुल गांधी ने अपने संसदीय क्षेत्र और आसपास के दौरों के दौरान मीरा पासी की प्रतिमा का अनावरण कर एक बड़ा सामाजिक संदेश देने की कोशिश की।
- हिस्सेदारी का नारा: राहुल गांधी अपनी जनसभाओं में लगातार “जिसकी जितनी हिस्सेदारी, उसकी उतनी भागीदारी” और जातीय जनगणना की मांग को उठा रहे हैं, ताकि पिछड़े और वंचित वर्गों में पैठ मजबूत की जा सके।
इन प्रमुख जातियों को साधने की तैयारी
सूत्रों के मुताबिक, यूपी कांग्रेस की नजर प्रदेश की उन गैर-यादव ओबीसी जातियों पर है जिनकी आबादी राज्य में करीब 26 फीसदी मानी जाती है। इनमें प्रमुख रूप से शामिल हैं: नाई, राजभर, निषाद, कश्यप, विश्वकर्मा, लोधी, पासी और अन्य अत्यंत पिछड़ी जातियां।
जमीन पर संगठन को मजबूत करने की कवायद
कांग्रेस केवल चुनावी गठबंधन के भरोसे नहीं बैठना चाहती, बल्कि वह धरातल पर अपना ढांचा मजबूत कर रही है। पिछले कुछ महीनों में पार्टी ने समाज के विभिन्न धड़ों के साथ लगातार बैठकें की हैं: किसानों, वकीलों, जाटों, गुर्जरों, निषादों, पासियों और सवर्ण समाज के साथ मैराथन बैठकें की गई हैं। यूपी प्रभारी अविनाश पांडे के संकेतों के मुताबिक, पार्टी आगामी पंचायत, ब्लॉक और जिला पंचायत चुनावों में पूरी ताकत के साथ उतरने वाली है ताकि ग्रामीण स्तर पर पकड़ मजबूत हो सके।
गठबंधन का भविष्य: एकजुटता या सीटों की खींचतान?
2024 के लोकसभा चुनाव में सपा और कांग्रेस का ‘INDIA’ गठबंधन बेहद सफल रहा था, जिसने भाजपा को कड़ी टक्कर दी। हालांकि, 2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर कुछ चुनौतियां भी सामने आ रही हैं:
- अखिलेश यादव का रुख: सपा प्रमुख ने साफ किया है कि गठबंधन एकजुट रहेगा, लेकिन सीट बंटवारे का आधार “जीतने की क्षमता” होगी।
- सीट शेयरिंग का पेंच: राजनैतिक जानकारों का मानना है कि आने वाले दिनों में दोनों दलों के बीच सीटों की संख्या को लेकर खींचतान देखने को मिल सकती है।
2017 बनाम 2024: जहाँ 2017 के विधानसभा चुनाव में सपा-कांग्रेस का गठबंधन बुरी तरह फेल साबित हुआ था, वहीं 2024 में दोनों की जुगलबंदी सुपरहिट रही। अब देखना यह है कि 2027 में सपा का ‘PDA’ (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूला और कांग्रेस की ‘EBC’ रणनीति मिलकर भाजपा के विजय रथ को रोक पाती है या नहीं।























