बुराई पर अच्छाई की जीत का संदेश, रंगों के पीछे छिपी हैं पौराणिक और ज्योतिषीय मान्यताएं




लखनऊ : होली केवल रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि खुशियों, प्रेम और नई शुरुआत का प्रतीक है। फाल्गुन पूर्णिमा पर होलिका दहन के बाद रंगों से खेलकर भारत और नेपाल में इसे धूमधाम से मनाया जाता है। दुनिया भर में बसे भारतीय भी अपनी परंपरा को उत्साह के साथ निभाते हैं। यह पर्व बुराई पर अच्छाई की जीत और अधर्म पर धर्म की विजय का संदेश देता है।
कृष्ण-राधा की रंग-लीला से जुड़ी कथा
पौराणिक कथाओं के अनुसार, बचपन में भगवान कृष्ण अपनी सांवली काया को लेकर चिंतित थे। उन्हें लगता था कि गोरी राधा उनका रंग पसंद नहीं करेंगी। तब माता यशोदा ने हंसते हुए कहा—“राधा के पास जाओ और उनके चेहरे पर रंग लगा दो।” कृष्ण ने ऐसा ही किया और राधा ने भी उन्हें रंग लगाया। इसी प्रेम-खेल से रंग लगाने की परंपरा की शुरुआत मानी जाती है, जो आज भी ब्रज क्षेत्र में विशेष उत्साह के साथ निभाई जाती है। यहां के रंग प्रेम, समानता, भक्ति और उल्लास के प्रतीक माने जाते हैं।
ज्योतिषीय नजरिए से रंगों का महत्व
होलाष्टक से लेकर होलिका दहन तक का समय ज्योतिष शास्त्र में ग्रहों की उग्र अवस्था का माना जाता है। इस अवधि में नकारात्मक ऊर्जा के बढ़ने की मान्यता है।
ज्योतिष के अनुसार—
- प्राकृतिक रंग ग्रहों के प्रतिकूल प्रभाव को कम करते हैं।
- सकारात्मक ऊर्जा और उत्साह का संचार करते हैं।
- चैत्र मास के आरंभ में मौसम परिवर्तन के दौरान रोगों से रक्षा में सहायक माने जाते हैं।
परंपरागत रूप से फूलों और जड़ी-बूटियों से बने गुलाल का उपयोग किया जाता था। आजकल प्रचलित रासायनिक (केमिकल) रंग त्वचा और स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो सकते हैं, इसलिए शास्त्र और विशेषज्ञ प्राकृतिक रंगों के उपयोग की सलाह देते हैं। होली का यह पर्व केवल रंगों की मस्ती नहीं, बल्कि प्रेम, समरसता और सकारात्मक ऊर्जा का उत्सव है—जो हर वर्ष जीवन में नई उमंग और नई शुरुआत का संदेश लेकर आता है।























