बसपा लखनऊ में बड़ी जनसभा कर कांशीराम की विरासत को करेगी याद
लखनऊ, संवाददाता : उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव करीब आते ही सभी राजनीतिक दलों की नजर दलित वोटबैंक पर टिक गई है। इसी रणनीति के तहत बहुजन समाज पार्टी, समाजवादी पार्टी और कांग्रेस सहित कई दल बसपा संस्थापक कांशीराम की जयंती को बड़े स्तर पर मनाने की तैयारी कर रहे हैं। कांशीराम की जयंती 15 मार्च को है और उससे पहले ही राजनीतिक दलों ने अपने-अपने कार्यक्रमों का ऐलान कर दिया है।
प्रदेश में दलित आबादी करीब 21 प्रतिशत मानी जाती है, जो चुनावी नतीजों को प्रभावित करने की क्षमता रखती है। उत्तर प्रदेश में 85 विधानसभा सीटें दलितों के लिए आरक्षित हैं, जबकि सामान्य सीटों पर भी दलित वोट कई जगह निर्णायक भूमिका निभाते हैं। इसी वजह से चुनाव से पहले सभी दल कांशीराम के नाम के जरिए दलित समाज को साधने की कोशिश में जुटे हैं। बसपा के लिए कांशीराम की विरासत सबसे अहम मानी जाती है। पार्टी ने इस बार उनकी जयंती को बड़े स्तर पर मनाने का फैसला किया है। लखनऊ में मुख्य जनसभा आयोजित होगी, जिसमें बड़ी संख्या में कार्यकर्ता और समर्थक शामिल होंगे। बसपा सुप्रीमो मायावती इस अवसर पर दलित एकजुटता का संदेश देंगी। पार्टी का मानना है कि कांशीराम के सिद्धांतों पर चलकर ही दलित समाज का उत्थान संभव है।
समाजवादी पार्टी ने भी इस मुद्दे पर सक्रियता दिखाई है। पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव के नेतृत्व में सपा ने प्रदेश के सभी जिलों में कांशीराम जयंती मनाने की घोषणा की है। सपा पहले से ही पिछड़े वर्ग और मुस्लिम मतदाताओं पर फोकस करती रही है, लेकिन अब वह दलित वोटबैंक को भी अपने साथ जोड़ने की कोशिश कर रही है। जिला स्तर पर कार्यक्रम आयोजित कर पार्टी सीधे दलित समाज तक पहुंचने की रणनीति पर काम कर रही है।
कांग्रेस ने भी कांशीराम जयंती को लेकर बड़ा कार्यक्रम आयोजित किया। इस कार्यक्रम में लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी शामिल हुए और दलित समाज के साथ संवाद किया। समारोह के दौरान कांशीराम को भारत रत्न देने का प्रस्ताव भी पारित किया गया। राहुल गांधी ने अपने संबोधन में कहा कि अगर जवाहरलाल नेहरू आज होते तो कांशीराम मुख्यमंत्री बनते। इस बयान को दलित वोटबैंक को साधने की राजनीतिक रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि उत्तर प्रदेश की राजनीति में दलित वोट हमेशा से निर्णायक रहे हैं। 21 प्रतिशत दलित मतदाता किसी भी चुनाव का रुख बदल सकते हैं। यही वजह है कि 2027 के चुनाव को देखते हुए सभी दल कांशीराम के नाम के सहारे दलित समाज से जुड़ने की कोशिश कर रहे हैं। अब देखना यह होगा कि राजनीतिक दलों की यह रणनीति दलित वोटरों को कितना प्रभावित करती है या फिर यह केवल चुनावी सियासत तक ही सीमित रह जाती है।
























