बेंच ने जताई नाराजगी: “जब कोर्ट में याचिका दायर हुई, तब जाकर जागा पुलिस प्रशासन”
लखनऊ, संवाददाता : 12 वर्षीय नाबालिग किशोरी की गुमशुदगी के मामले में लखनऊ कमिश्नरेट की ढीली कार्यप्रणाली पर हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने गहरा असंतोष व्यक्त किया है। कोर्ट ने तल्ख टिप्पणी करते हुए पुलिस आयुक्त (कमिशनर) से लखनऊ के सभी थाना क्षेत्रों से गुमशुदा हुई सभी किशोरियों की विस्तृत सूची तलब की है।
न्यायालय ने मामले की गंभीरता को देखते हुए पुलिस उपायुक्त सभी थाना प्रभारियों एसएचओ और क्षेत्राधिकारियों को 10 जून को व्यक्तिगत रूप से कोर्ट में हाजिर होने का आदेश दिया है।
पुलिस उपायुक्त के हलफनामे से हुआ चौंकाने वाला खुलासा
सुनवाई के दौरान पुलिस उपायुक्त दीक्षा शर्मा ने कोर्ट में व्यक्तिगत हलफनामा दाखिल किया। इस हलफनामे से लखनऊ में नाबालिगों की सुरक्षा को लेकर एक चिंताजनक तस्वीर सामने आई है: डीसीपी के अधीन आने वाले 9 थाना क्षेत्रों में कुल 81 लड़कियों (जिनमें अधिकतर नाबालिग हैं) का या तो अपहरण हुआ या उन्हें बहला-फुसलाकर ले जाया गया। पुलिस ने इनमें से 66 लड़कियों को बरामद कर लिया है। कुल 15 किशोरियां अभी भी लापता हैं, जिनका पुलिस के पास कोई सुराग नहीं है।
“कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद जागी पुलिस”
मामले की सुनवाई करते हुए न्यायाधीश प्रवीण कुमार गिरि ने पुलिस की कार्यशैली पर कड़े सवाल उठाए। जस्टिस गिरि ने आदेश में कहा: “चार महीने से गायब किशोरी के पिता ने जब हाईकोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus) याचिका दायर की, तब जाकर कमिश्नरेट के अधिकारी जागे और आनन-फानन में किशोरी को बरामद कर न्यायालय में पेश किया।” न्यायालय ने मामले के जांच अधिकारी (IO) सब-इंस्पेक्टर ओपी पर भी गंभीर टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि जांच अधिकारी ने न तो मामले की उचित तफ्तीश की और न ही नाबालिग को ढूंढने का कोई गंभीर प्रयास किया। कोर्ट के दखल के बाद ही लड़की की बरामदगी हो सकी, जो खुद पुलिस की लचर जांच प्रणाली को उजागर करता है।
‘छिपे हुए मामलों’ का भी लगाएं पता
हाईकोर्ट ने अंदेशा जताया है कि राजधानी में ऐसे कई और मामले हो सकते हैं, जिनकी जानकारी शायद पुलिस को भी न हो। कोर्ट ने लखनऊ पुलिस कमिश्नर को निम्नलिखित निर्देश दिए हैं:
कमिश्नर लखनऊ 3 दिनों के अंदर इस तरह के सभी मामलों की खुद निगरानी करें और कोर्ट को रिपोर्ट सौंपें। सभी एसएचओ, चौकी प्रभारियों और जांच अधिकारियों को तुरंत सतर्क किया जाए, क्योंकि यह मामला नाबालिग लड़कियों के जीवन और उनकी स्वतंत्रता से जुड़ा है। पुलिस कमिश्नर ऐसे मामलों का भी पता लगाएं, जिनकी गुमशुदगी या अपहरण की रिपोर्ट अब तक थानों में दर्ज नहीं कराई जा सकी है। इस मामले की अगली सुनवाई 10 जून को नियत की गई है, जिसमें लखनऊ पुलिस कमिश्नर को राजधानी के सभी थानों में दर्ज ऐसी घटनाओं पर स्पष्टीकरण देना होगा।























