“गौरैया की वापसी का रास्ता-फलदार वृक्षों से हरियाली और जीवन”— रीना त्रिपाठी

लखनऊ, संवाददाता : शहरों की बदलती तस्वीर ने हमारी सुबहों की पहचान भी बदल दी है। कभी घरों के आंगन, खिड़कियों और छतों पर चहकने वाली गौरैया अब धीरे-धीरे हमारी जिंदगी से गायब होती जा रही है। उसकी मधुर चहचहाहट, जो सुबह का एहसास कराती थी, अब विरले ही सुनाई देती है। यह केवल एक पक्षी के लुप्त होने की कहानी नहीं, बल्कि पर्यावरणीय असंतुलन का गंभीर संकेत है।

विशेषज्ञों के अनुसार, गौरैया और अन्य छोटे पक्षियों की घटती संख्या का मुख्य कारण फलदार वृक्षों की लगातार कमी है। पहले आम, अमरूद, जामुन, बेर और आंवला जैसे पेड़ों की भरमार होती थी, जो पक्षियों के लिए भोजन और सुरक्षित आश्रय दोनों उपलब्ध कराते थे। इन पेड़ों पर पनपने वाले कीट-पतंगे पक्षियों का मुख्य आहार होते थे और घनी शाखाएं घोंसले बनाने के लिए उपयुक्त स्थान देती थीं। लेकिन तेज़ी से बढ़ते शहरीकरण ने इस प्राकृतिक संतुलन को बिगाड़ दिया है। कंक्रीट के जंगल, बहुमंजिला इमारतें और सीमित हरित क्षेत्र फलदार वृक्षों की जगह ले रहे हैं। नई कॉलोनियों में सजावटी पौधों को प्राथमिकता दी जा रही है, जिससे पारिस्थितिकी तंत्र कमजोर होता जा रहा है।

उत्तर प्रदेश में भी यह समस्या स्पष्ट रूप से देखी जा सकती है। वर्ष 2000 के आसपास जहां फलदार वृक्षों का क्षेत्रफल 9–10 लाख हेक्टेयर था, वहीं 2020 के बाद यह घटकर 7–8 लाख हेक्टेयर रह गया। यह गिरावट राज्य की बागवानी परंपरा और पर्यावरण दोनों के लिए चिंता का विषय है। लखनऊ, जो कभी बाग-बगीचों के लिए प्रसिद्ध था, आज तेजी से बदल रहा है। पुराने बगीचे समाप्त हो रहे हैं और नई परियोजनाओं में फलदार पेड़ों का स्थान सीमित होता जा रहा है। सड़क चौड़ीकरण और निर्माण कार्यों के चलते सैकड़ों पेड़ों की कटाई हो चुकी है। इसका असर केवल गौरैया तक सीमित नहीं है। कौआ, बुलबुल, मैना और तोता जैसे पक्षी भी अपने प्राकृतिक आवास खो रहे हैं। भोजन की कमी, घोंसलों की अनुपलब्धता और बढ़ता प्रदूषण इनके अस्तित्व के लिए खतरा बन चुके हैं। पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि समाधान कठिन नहीं है। यदि हर घर, मोहल्ले और संस्था में कम से कम एक फलदार वृक्ष लगाया जाए, तो स्थिति में सुधार संभव है। आम, अमरूद, नींबू और अनार जैसे पौधे आसानी से लगाए जा सकते हैं। साथ ही छतों और बालकनियों में गमलों के माध्यम से भी हरियाली बढ़ाई जा सकती है।

सरकारी स्तर पर भी वृक्षारोपण योजनाओं में फलदार वृक्षों को प्राथमिकता देना आवश्यक है। स्कूलों में “एक छात्र–एक फलदार पेड़” जैसे अभियान बच्चों को प्रकृति से जोड़ने में सहायक हो सकते हैं। पर्यावरण संरक्षण केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि हर नागरिक का कर्तव्य है। स्वच्छ हवा, बेहतर जलवायु और जैव विविधता के लिए हमें सामूहिक प्रयास करने होंगे। भारत ने वर्ष 2070 तक नेट जीरो कार्बन का लक्ष्य रखा है, जिसे जनभागीदारी के बिना हासिल करना संभव नहीं है। स्थानीय स्तर पर भी सकारात्मक पहल हो रही है, जहां जनप्रतिनिधि फलदार वृक्षारोपण को बढ़ावा दे रहे हैं। गौरैया की वापसी केवल एक पक्षी की वापसी नहीं होगी, बल्कि यह हमारे पर्यावरणीय संतुलन और संवेदनशीलता की पुनर्स्थापना का प्रतीक होगी।
“जब फलदार पेड़ बढ़ेंगे, तब ही गौरैया लौटेगी;
और जब गौरैया लौटेगी, तब ही प्रकृति मुस्कुराएगी।”























