लखनऊ विश्वविद्यालय की डॉ. ऋचा सक्सेना के शोध में ‘मासिक धर्म अवकाश’ की जरूरत पर जोर
लखनऊ,संवाददाता : महिलाओं का मासिक धर्म एक प्राकृतिक जैविक प्रक्रिया है, जिससे केवल महिलाएं ही नहीं, बल्कि ट्रांसजेंडर, इंटरसेक्स और नॉनबाइनरी व्यक्ति भी प्रभावित होते हैं। इसके बावजूद सरकार की ओर से अब तक इस विषय पर कोई स्पष्ट और व्यापक नीतियां नहीं बनाई गई हैं। लखनऊ विश्वविद्यालय के एक शोध अध्ययन में कार्यस्थलों पर अनुकूल वातावरण और आवश्यक सुविधाओं के अभाव को लेकर भारत सहित वैश्विक स्तर पर गंभीर स्थिति सामने आई है।
लखनऊ विश्वविद्यालय की डॉ. ऋचा सक्सेना द्वारा किए गए इस शोध का खुलासा छोटा नागपुर लॉ जर्नल के नवीनतम अंक में प्रकाशित शोध–पत्र “नीड टू ब्लीड, हाइजीन ऑर लीव” में किया गया है। इस अध्ययन में कार्यस्थलों पर मासिक धर्म (मेंसुरेशन) से जुड़ी चुनौतियों और ‘मासिक धर्म अवकाश’ की आवश्यकता पर विस्तार से चर्चा की गई है।
डॉ. सक्सेना ने अपने शोध में स्पष्ट किया है कि मासिक धर्म केवल एक निजी विषय नहीं, बल्कि कार्यस्थलों से जुड़ा सामाजिक और नीतिगत मुद्दा है। इस दौरान होने वाली शारीरिक असुविधा के साथ-साथ कार्यस्थलों और सार्वजनिक स्थानों पर स्वच्छता, आराम और गोपनीयता से जुड़ी अपर्याप्त सुविधाएं स्थिति को और अधिक कठिन बना देती हैं। शोध में यह भी रेखांकित किया गया है कि समावेशी नीतियों के अभाव में बड़ी आबादी प्रभावित हो रही है और कार्यक्षमता पर नकारात्मक असर पड़ता है। अध्ययन में मासिक धर्म को लेकर संवेदनशील दृष्टिकोण अपनाने, अनुकूल कार्यस्थल वातावरण और ‘मेंस्ट्रुअल लीव’ जैसी नीतियों को लागू करने की आवश्यकता पर जोर दिया गया है।
























