नागपुर में वीएचपी कार्यालय शिलान्यास कार्यक्रम में बोले—दुनिया युद्ध खत्म करने के लिए भारत की ओर देख रही
नागपुर: मोहन भागवत ने शुक्रवार को नागपुर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े कार्यक्रम में वैश्विक शांति में भारत की भूमिका पर जोर दिया। वह विश्व हिंदू परिषद के विदर्भ प्रांत कार्यालय के शिलान्यास समारोह में शामिल हुए। उन्होंने कहा कि मौजूदा वैश्विक अस्थिरता और युद्ध की स्थिति को समाप्त करने के लिए दुनिया भारत की ओर उम्मीद से देख रही है। उनके अनुसार, भारत अपने मूल्यों और ‘धर्म’ की अवधारणा के आधार पर संतुलन स्थापित करने में सक्षम है।
भागवत ने कहा कि मध्य पूर्व और अन्य क्षेत्रों में जारी संघर्षों के बीच कई देशों की अपेक्षा है कि भारत मध्यस्थ की भूमिका निभाए। उन्होंने दावा किया कि क्षेत्र की जटिल प्रकृति को देखते हुए केवल भारत ही वहां स्थायी शांति स्थापित कर सकता है। उन्होंने वर्तमान वैश्विक परिदृश्य की आलोचना करते हुए कहा कि आज दुनिया ‘जंगल के कानून’ पर चल रही है, जहां ताकतवर देश कमजोरों पर हावी हो जाते हैं। इसके विपरीत, भारत का दृष्टिकोण ‘मानवता के कानून’ पर आधारित है, जो संतुलन और न्याय की बात करता है।
भागवत ने भेड़िये और मेमने की कहानी का उदाहरण देते हुए बताया कि कैसे शक्ति का दुरुपयोग कर आक्रामकता को सही ठहराया जाता है। उन्होंने कहा कि नैतिक बल के अभाव में सत्य और निर्दोषता दब जाती है। उन्होंने यह भी कहा कि पिछले 2000 वर्षों में विभिन्न विचारधाराएं स्थायी शांति स्थापित करने में विफल रही हैं, क्योंकि उनमें एकता और परस्पर जुड़ाव की कमी रही है। भागवत के अनुसार, सनातन धर्म और भारतीय संविधान की प्रस्तावना में निहित मूल्यों में वैश्विक शांति का आधार है। उन्होंने कहा कि जब तक सभी समाज शांति में नहीं होंगे, तब तक वास्तविक वैश्विक सुख संभव नहीं है। उन्होंने भारत के भीतर भी नैतिक आचरण और आंतरिक शक्ति पर जोर दिया। जैन, बौद्ध और सिख धर्मों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि भले ही उनके दर्शन अलग हों, लेकिन सभी का मूल संदेश सत्य, अहिंसा, सेवा और ईमानदारी है।
























