ज्योतिषाचार्य डॉ. उमाशंकर मिश्र
एकादशी तिथि प्रारंभ
14 नवंबर 2025, शुक्रवार को रात्रि 3:46 से, अर्थात 15 नवंबर दिन शनिवार सुबह 3:46 से।
एकादशी तिथि समापन
15 नवंबर 2025, शनिवार रात्रि 4:23 पर, अर्थात 16 नवंबर दिन रविवार सुबह 4:23 पर।
एकादशी तिथि पारण
16 नवंबर 2025, रविवार सुबह 8:00 से सुबह 11:00 तक।
विशेष:
एकादशी का व्रत सूर्योदय तिथि अर्थात आज 15 नवंबर 2025, शनिवार के दिन रखें। शुक्रवार सायं एवं शनिवार व्रत के दिन खाने में चावल या चावल से बनी किसी भी वस्तु का प्रयोग बिल्कुल भी न करें। यदि आप व्रत नहीं रखते हैं तो भी इसका पालन करें।
उत्पन्ना एकादशी का नाम और महत्त्व
उत्पत्ति एकादशी का नाम किस प्रकार पड़ा, और माता एकादशी का प्रागट्य कैसे हुआ? प्रभु श्री हरि विष्णु जी के शरीर से एक स्त्री/देवी उत्पन्न हुई और उसी देवी ने मुरु नामक राक्षस का वध किया। चूँकि यह घटना एकादशी तिथि को घटी थी, इसलिए इसे उत्पत्ति एकादशी कहते हैं। यह तिथि विशेष रूप से नए भक्तों के लिए है जो एकादशी का व्रत शुरू करना चाहते हैं। उन्हें इस तिथि से ही अपने व्रत की शुरुआत करनी चाहिए।
सूतजी का वृत्तांत
सूतजी ने कहा, “हे ऋषियों! उत्पत्ति एकादशी व्रत का यह वृत्तांत भगवान श्री कृष्ण ने अपने परम भक्त युधिष्ठिर से कहा था।” युधिष्ठिर ने भगवान श्री कृष्ण से पूछा था कि एकादशी व्रत किस विधि से किया जाता है और इसका क्या फल प्राप्त होता है। श्री कृष्ण ने उत्तर दिया, “जो मनुष्य विधिपूर्वक एकादशी का व्रत करते हैं, उन्हें शंखोद्धार तीर्थ में स्नान करके भगवान के दर्शन करने से जो पुण्य प्राप्त होता है, वह एकादशी व्रत के सोलहवें भाग के समान भी नहीं है।”
एकादशी व्रत का माहात्म्य:
- जो मनुष्य एकादशी का व्रत करते हैं, उन्हें अश्वमेध यज्ञ, भूमिदान, कन्यादान, और विद्यादान से भी अधिक पुण्य प्राप्त होता है।
- एकादशी व्रत के पुण्य का प्रभाव देवताओं को भी दुर्लभ होता है।
- रात्रि में फलाहार करने वाले को उपवास का आधा फल मिलता है।
- निर्जल व्रत रखने वाले का पुण्य तो देवता भी वर्णन नहीं कर सकते।
एकादशी व्रत विधि:
- हेमंत ऋतु में मार्गशीर्ष कृष्ण एकादशी से इस व्रत की शुरुआत होती है।
- दशमी तिथि को सायंकाल भोजन के बाद अच्छी तरह से दातुन करें।
- एकादशी के दिन प्रात: उठकर सबसे पहले व्रत का संकल्प लें।
- शुद्ध जल से स्नान करें।
- व्रत करने वाले को चोर, पाखंडी, परस्त्रीगामी, निंदक, मिथ्याभाषी से बचना चाहिए।
- स्नान के बाद भगवान का पूजन करें और रात्रि में दीपदान करें।
- रात्रि में भजन-कीर्तन करें।
ओम नमो नारायणाय























