सौभाग्य, पाप नाश और मोक्ष प्रदान करने वाली मानी गई है यह तिथि
वैशाख मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को आज वरूथिनी एकादशी के रूप में मनाया जा रहा है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यह तिथि सौभाग्य, पाप नाश और मोक्ष प्रदान करने वाली मानी गई है।
पौराणिक कथा के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण ने धर्मराज युधिष्ठिर को बताया कि यह एकादशी अत्यंत पुण्यदायी है। इसके व्रत से व्यक्ति को हजार वर्षों की तपस्या के समान फल प्राप्त होता है तथा कन्यादान और अन्नदान के समान पुण्य मिलता है। धार्मिक ग्रंथों में उल्लेख है कि वरूथिनी एकादशी का व्रत करने से जीवन में सुख-समृद्धि बढ़ती है और अंततः मोक्ष की प्राप्ति होती है। इस व्रत के प्रभाव से राजा मान्धाता और धुंधुमार जैसे राजाओं को भी स्वर्गलोक की प्राप्ति हुई थी।
व्रत नियम और सावधानियां:
एकादशी के दिन तथा दशमी की रात्रि से ही संयम और नियमों का पालन आवश्यक माना गया है। शास्त्रों के अनुसार कांस्य पात्र में भोजन, मांसाहार, मधु, मसूर, परान्न, पुनर्भोजन, क्रोध, झूठ और निंदा जैसे कर्मों का त्याग करना चाहिए। साथ ही भक्ति और भगवान विष्णु के स्मरण को प्राथमिकता देने का विधान है। द्वादशी के दिन भी संयम रखते हुए ही व्रत का पारण किया जाता है, जिसे प्रातःकाल 8 बजे से 11 बजे के बीच करना श्रेष्ठ माना गया है।
धार्मिक महत्व:
इस एकादशी के माहात्म्य का श्रवण करने मात्र से हजार गोदान के बराबर पुण्य प्राप्त होता है, ऐसा शास्त्रों में वर्णित है। भक्तों के लिए यह दिन संयम, भक्ति और आत्मशुद्धि का विशेष अवसर है























