उत्तरायण का आरंभ, तिलगुड़ की मिठास और दान-पुण्य से जुड़ा है मकर संक्रांति का धार्मिक व सांस्कृतिक महत्व
प्रयागराज,संवाददाता : मनुष्य स्वभाव से उत्सवप्रिय प्राणी है। विभिन्न उत्सवों के माध्यम से वह अपने भावों की अभिव्यक्ति करता है। हिंदू धर्म में मनाए जाने वाले पर्व केवल धार्मिक कर्मकांड तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे मनुष्य को प्रकृति के अधिक समीप ले जाने का माध्यम भी हैं। ऐसा ही एक महत्वपूर्ण पर्व है मकर संक्रांति, जिसे प्रकृति के साथ सामंजस्य स्थापित करने वाला पर्व माना जाता है। देश के विभिन्न हिस्सों में यह पर्व अलग-अलग नामों से जाना जाता है। दक्षिण भारत में इसे पोंगल, सिंधी समाज में तिरमौरी, गुजरात में उत्तरायण, जबकि महाराष्ट्र और हिंदी भाषी क्षेत्रों में मकर संक्रांति के रूप में मनाया जाता है।
मकर संक्रांति का काल और धार्मिक मान्यताएँ
मकर संक्रांति के दिन सूर्य मकर राशि में प्रवेश करता है। यह पर्व आपसी मतभेद भुलाकर प्रेम और सौहार्द बढ़ाने का संदेश देता है। इसी भाव के साथ लोग एक-दूसरे को तिलगुड़ देकर कहते हैं— “तिलगुड़ लो, मीठा बोलो।” यह पर्व तिथि आधारित नहीं होता। वर्तमान में यह 14 जनवरी को मनाया जाता है, हालांकि सूर्य की गति के कारण कभी-कभी यह 15 जनवरी को भी पड़ता है। वर्ष 2026 में मकर संक्रांति 14 जनवरी को होगी। हिंदू मान्यताओं के अनुसार संक्रांति देवी स्वरूप हैं। कथा के अनुसार देवी ने संकरासुर का वध किया था, जबकि अगले दिन ‘किंक्रांत’ या ‘करिदिन’ पर किंकरासुर का संहार किया गया।
उत्तरायण का महत्व
इस दिन से सूर्य का उत्तरायण आरंभ होता है। सूर्योदय से सूर्यास्त तक का समय अत्यंत पुण्यदायी माना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि उत्तरायण काल में देह त्याग करना विशेष फलदायी होता है, जबकि कर्क संक्रांति से मकर संक्रांति तक का समय दक्षिणायन कहलाता है।
हल्दी-कुंकू और वाण देने की परंपरा
मकर संक्रांति से रथ सप्तमी तक हल्दी-कुंकू के कार्यक्रम किए जाते हैं। इस दिन ब्रह्मांड की चंद्र नाड़ी सक्रिय रहती है और रज-सत्त्व तरंगें अधिक प्रभावी होती हैं, जिससे यह कर्म अधिक फलदायी माना जाता है। मकर संक्रांति पर सुवासिनियों को हल्दी-कुंकू के साथ दान देने की परंपरा को ‘वाण देना’ कहा जाता है। शास्त्रों के अनुसार वाण में सात्त्विक वस्तुएँ जैसे धार्मिक ग्रंथ, सौभाग्य सामग्री, अगरबत्ती, उबटन, देवताओं के चित्र आदि देने चाहिए। अधार्मिक वस्तुएँ देने की परंपरा को शास्त्रसम्मत नहीं माना गया है।
सुगड़ का वाण देने की परंपरा
इस पर्व पर सुगड़ (मिट्टी का छोटा घड़ा) विशेष महत्व रखता है। इसमें गाजर, बेर, गन्ना, मटर, तिलगुल, कपास आदि रखकर पूजा की जाती है। पाँच सुगड़ों में से तीन सुहागिन स्त्रियों को, एक तुलसी को और एक अपने लिए रखा जाता है।
तीर्थ स्नान और तिलगुड़ का महत्व
मकर संक्रांति के दिन तीर्थ स्नान करने से महापुण्य की प्राप्ति होती है। गंगा, यमुना, गोदावरी, कृष्णा और कावेरी नदियों में स्नान को विशेष फलदायी माना गया है।
तिलगुड़ का सेवन आत्मशुद्धि और सकारात्मक ऊर्जा प्रदान करता है। भगवान को अर्पित कर तिलगुड़ देने से वह प्रसाद बन जाता है।
शिशु मंगल संस्कार
शिशु के जन्म के बाद आने वाली पहली मकर संक्रांति पर शिशु मंगल संस्कार किया जाता है। यह संस्कार विशेष रूप से महाराष्ट्र में प्रचलित है, जिससे बच्चे के अच्छे स्वास्थ्य और ऋतु अनुकूलता की कामना की जाती है।
काले वस्त्र पहनने की परंपरा पर भ्रम
आचार्य पंडित जय गोविंद तिवारी के अनुसार मकर संक्रांति के दिन काले वस्त्र पहनने का किसी भी धर्मग्रंथ में उल्लेख नहीं है। अतः इस दिन काले वस्त्र धारण करने की परंपरा को शास्त्रसम्मत नहीं माना जाता।























