चुनाव से पहले सत्ताधारी दल में उभरते असंतोष ने बढ़ाई चिंता
लखनऊ,संवाददाता : उत्तर प्रदेश में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले सभी राजनीतिक दल तैयारियों में जुटे हैं। इसी बीच सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के भीतर उभरते विरोधी सुरों ने पार्टी नेतृत्व की चिंता बढ़ा दी है। जनप्रतिनिधियों बनाम अधिकारियों और सरकार बनाम संगठन के बीच खिंची लकीरें अब सार्वजनिक मंचों पर भी दिखाई देने लगी हैं।
महोबा में सड़क पर दिखा टकराव
30 जनवरी को महोबा में कैबिनेट मंत्री स्वतंत्र देव सिंह और स्थानीय विधायक बृजभूषण राजपूत के बीच सड़क पर हुआ विवाद अकेली घटना नहीं है। बीते समय में ऐसे कई मामले सामने आए हैं, जहां जनप्रतिनिधियों की नाराजगी और महत्वाकांक्षा ने संगठनात्मक अनुशासन को चुनौती दी है। सूत्रों के मुताबिक, मंत्रिमंडल में संभावित फेरबदल, पंचायत चुनाव, प्रदेश संगठन विस्तार और 2027 विधानसभा चुनाव को देखते हुए भाजपा और RSS के बीच समन्वय बैठक का नया एजेंडा तैयार किया जा रहा है, ताकि असंतोष के सुरों को शांत किया जा सके।
असंतोष की शुरुआत और संकेत
जमीनी स्तर पर जनप्रतिनिधियों में असंतोष की शुरुआत जुलाई 2022 में देखने को मिली थी, जब जलशक्ति राज्यमंत्री दिनेश खटीक ने अधिकारियों पर उपेक्षा और भ्रष्टाचार के आरोप लगाते हुए सार्वजनिक रूप से इस्तीफा दे दिया था। इस घटना ने साफ संकेत दिया कि पार्टी के भीतर सब कुछ ठीक नहीं चल रहा।
लोकसभा चुनाव में दिखा असर
2024 के लोकसभा चुनाव के दौरान मुजफ्फरनगर सीट पर केंद्रीय मंत्री डॉ. संजीव बालियान और BJP के पूर्व विधायक संगीत सोम के बीच खुली जुबानी जंग देखने को मिली। इसका असर कई सीटों पर चुनावी परिणामों में भी दिखा। परिणाम आने के बाद सहारनपुर से भाजपा प्रत्याशी राघव लखनपाल शर्मा ने अपनी हार के लिए पार्टी के ही मंत्री और विधायक को जिम्मेदार ठहराकर सियासी पारा और चढ़ा दिया।
अधिकारियों पर लगातार आरोप
गाजियाबाद के लोनी विधायक नंद किशोर गुर्जर कई बार अधिकारियों पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाकर अपनी ही सरकार को कठघरे में खड़ा कर चुके हैं। वहीं, जून 2023 में कानपुर के बिठूर से विधायक अभिजीत सिंह सांगा ने डीएम और सीएमओ विवाद में सीएमओ को हटाने की मांग को लेकर मोर्चा खोला, जबकि विधानसभा अध्यक्ष सतीश महाना समेत तीन विधायक सीएमओ के समर्थन में खड़े नजर आए।
ब्राह्मण समाज को लड़ाने का आरोप
बाल विकास राज्यमंत्री प्रतिभा शुक्ला ने जुलाई में कानपुर देहात की अकबरपुर कोतवाली में पुलिस के खिलाफ धरना दिया था। इस दौरान उन्होंने अपने ही दल के सांसद देवेंद्र भोले पर ब्राह्मण समाज को आपस में लड़ाने का गंभीर आरोप लगाया। इतना ही नहीं, भ्रष्टाचार के आरोपों से आहत होकर उन्होंने मिश्रिख से सांसद अशोक रावत को एक करोड़ रुपये की मानहानि नोटिस भी भेजी।
मारपीट और मंच पर तनाव
पिछले साल अगस्त में कारागार राज्यमंत्री सुरेश राही ने सीतापुर के हरगांव विद्युत उपकेंद्र में धरना दिया था। अक्टूबर में वाराणसी में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के सामने मंच पर राज्यमंत्री रवीन्द्र जायसवाल और पूर्व मंत्री डॉ. नीलकंठ तिवारी के बीच पटका पहनाने को लेकर तनावपूर्ण स्थिति बनी। 31 जनवरी को अयोध्या में डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य के कार्यक्रम के दौरान जिलाध्यक्ष संजीव सिंह और पार्टी नेता सच्चिदानंद पांडे के बीच मारपीट का मामला भी सामने आया।
इन तमाम घटनाओं पर भाजपा प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी ने कहा, भाजपा संगठन आधारित पार्टी है। जनहित के मुद्दों को लेकर कभी-कभी मतभिन्नता हो सकती है, लेकिन अनुशासन सर्वोपरि है। हालांकि, राजनीतिक जानकार मानते हैं कि चुनाव से पहले बढ़ती ये घटनाएं पार्टी के लिए चुनौती बन सकती हैं।






















