साधना से पहले कुलदेवी का स्मरण क्यों आवश्यक माना गया है
डॉ उमाशंकर मिश्र,लखनऊ : भारतीय सनातन परंपरा में किसी भी साधना, उपासना या आध्यात्मिक मार्ग पर अग्रसर होने से पूर्व कुलदेवी की कृपा को अत्यंत आवश्यक माना गया है। मान्यता है कि कुलदेवी की कृपा के बिना न तो किसी कुल का नाम, यश, स्थिरता और न ही वंश परंपरा सुदृढ़ रूप से आगे बढ़ पाती है। इसे प्रायः “सौ सुनार की, एक लोहार की” संज्ञा दी जाती है—अर्थात कुलदेवी की एक कृपा, अनेक साधनाओं से अधिक प्रभावी मानी जाती है।
आज के समय में अनेक लोग भावुकता या आकर्षणवश कुण्डलिनी, श्रीविद्या, दशमहाविद्या अथवा अन्य गूढ़ साधनाओं की ओर अग्रसर हो जाते हैं, किंतु यह नहीं समझ पाते कि कुलदेवी को स्मरण किए बिना की गई साधना फलदायी नहीं मानी जाती। ऐसी स्थिति में मान्यता अनुसार साधना निष्फल हो सकती है और कुलदेवी की उपेक्षा से असंतोष भी बढ़ सकता है। दक्षिण भारत और महाराष्ट्र जैसे क्षेत्रों में आज भी कुलदेवी परंपराएं जीवित हैं। घर के पूजा स्थल में सुपारी या प्रतिमा के रूप में कुलदेवी का पूजन, लंबी यात्रा से पूर्व अनुमति लेना, तथा वर्ष में एक या दो बार लघुरुद्र या नवचंडी जैसे अनुष्ठान करना—ये परंपराएं आज भी अनेक परिवारों में निभाई जाती हैं।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार प्रत्येक परिवार की एक कुलदेवी होती है, किंतु वर्तमान समय में भारत के लगभग 70 प्रतिशत परिवार अपनी कुलदेवी के नाम और स्वरूप से अनभिज्ञ हैं। माना जाता है कि इससे परिवार पर एक प्रकार का नकारात्मक दबाव बनता है, जिसके कारण पीढ़ीगत समस्याएं उत्पन्न होती हैं।
अनुभवों के आधार पर कई स्थानों पर निम्न समस्याएं देखने को मिलती हैं—
- पीढ़ी दर पीढ़ी समान प्रकार की बीमारियाँ
- पूरे परिवार में मानसिक तनाव या विकृतियाँ
- भोग-विलास की ओर अत्यधिक झुकाव और संपत्ति का नाश
- बच्चों का गलत मार्ग पर चले जाना
- शिक्षा में निरंतर बाधाएँ
- योग्य होने के बावजूद स्थायी रोजगार का अभाव
- धन होते हुए भी मानसिक शांति का न मिलना
- यात्राओं में बार-बार विघ्न या दुर्घटनाएँ
- व्यवसाय में स्थिरता और प्रभाव का अभाव
- विदेशों में बसे परिवारों में असंतोष और निरंतर अड़चनें
यह भी माना जाता है कि इन समस्याओं का समाधान केवल हीलिंग, ध्यान या मंत्र-साधना से नहीं होता। परंपरागत मत के अनुसार, दशमहाविद्या की दीक्षा से पूर्व गुरु द्वारा साधक की कुलदेवी का जागरण कराया जाता है। आज इस परंपरा की उपेक्षा के कारण कई साधक असंतुलन और विफलता का सामना करते हैं। कई लोग तीर्थयात्राओं—जैसे चारधाम, तिरुपति, शिर्डी या अन्य प्रसिद्ध धामों—को ही पर्याप्त मान लेते हैं, किंतु मान्यता है कि इससे कुलदेवी स्वतः प्रसन्न नहीं होतीं। धार्मिक दृष्टिकोण से कहा जाता है कि अन्य देव शक्तियाँ भी पहले अपने मूल—माता-पिता और कुल परंपरा—का स्मरण करने का संदेश देती हैं।
इतिहास और लोकमान्यताओं में ऐसे अनेक उदाहरण मिलते हैं, जहाँ कुलदेवी के रोष से राजवंश, संस्थान और परिवार समाप्त हो गए। सनातन परंपरा में यह संदेश स्पष्ट रूप से दिया गया है कि किसी भी साधना, उपासना या आध्यात्मिक मार्ग पर बढ़ने से पूर्व कुलदेवी का पूजन और स्मरण प्रथम कर्तव्य माना जाना चाहिए—न केवल स्वयं के लिए, बल्कि आने वाली पीढ़ियों की स्थिरता और कल्याण के लिए भी।
























