परम भागवत पद रत्नाकर – पद संख्या 49 : शक्ति और शक्तिमान के नित्य अभेद का रहस्य
धर्म डेस्क : आज बसंत पंचमी के पावन अवसर पर, सरस्वती माता की वंदना करते हुए आइए इस अत्यंत दिव्य प्रार्थना का पाठ करें और इसके अंत में निहित गूढ़ आध्यात्मिक रहस्य को हृदय से समझने का प्रयास करें। किसी भी देवी-देवता की वंदना करते समय हम उनसे कुछ भी सांसारिक न माँगें,
बल्कि केवल और केवल श्रीराधा रानी के चरणों में विशुद्ध, निष्काम प्रेम की याचना करें—यही परम साध्य है ।
पद का भाव-सार / दिव्य रहस्य
यह पद एक अत्यंत गहन सिद्धांत को प्रकट करता है— शक्ति और शक्तिमान कभी पृथक नहीं होते।
- शक्ति के बिना ब्रह्म, विष्णु या शिव का अस्तित्व भी संभव नहीं।
- जैसे अग्नि बिना उष्णता और सूर्य बिना प्रकाश के नहीं रह सकता,
वैसे ही भगवान बिना शक्ति के “भगवान” नहीं कहलाते। - श्रीराधा के बिना श्रीकृष्ण अधूरे हैं,
जैसे सीता के बिना राम और शक्ति के बिना शिव “शव” तुल्य हैं। - यह पद स्पष्ट करता है कि समस्त देवियाँ—राधा, दुर्गा, लक्ष्मी, सरस्वती—एक ही मूल दिव्य शक्ति के स्वरूप हैं,
और वह मूल शक्ति श्रीराधा हैं। अंततः साधक यही प्रार्थना करता है—
“हे करुणामयी देवी!
अपने राधा-रूप चरणों की रज प्रदान कर
और तुरंत कृपा का विस्तार करो।”






















