आध्यात्मिक ज्ञान भारत की विरासत, अहंकार से बचकर ‘हम’ की भावना अपनाने की जरूरत
लखनऊ,संवाददाता : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के प्रमुख मोहन भागवत ने रविवार को कहा कि जब तक धर्म भारत का मार्गदर्शन करता रहेगा, तब तक देश ‘विश्वगुरु’ बना रहेगा। एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि ऐसा गहन आध्यात्मिक ज्ञान दुनिया के अन्य हिस्सों में नहीं पाया जाता। धर्म ही पूरे ब्रह्मांड को संचालित करता है और सृष्टि उसी सिद्धांत पर चलती है।
भागवत ने कहा कि भारत को अपने पूर्वजों से एक समृद्ध आध्यात्मिक धरोहर विरासत में मिली है और साधु-संतों के मार्गदर्शन से यह परंपरा आगे बढ़ी है। उन्होंने स्पष्ट किया कि धर्म केवल धार्मिकता तक सीमित नहीं है, बल्कि प्रकृति में हर व्यक्ति और हर तत्व का अपना नैतिक कर्तव्य और अनुशासन होता है।
आरएसएस प्रमुख ने कहा कि दुनिया के पास इस प्रकार का आध्यात्मिक ज्ञान नहीं है, क्योंकि वहां आध्यात्मिकता की कमी है। यह ज्ञान हमारे पूर्वजों की विरासत है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि चाहे कोई भी व्यक्ति हो, सभी को एक ही शक्ति संचालित कर रही है और यदि जीवन का वाहन उस शक्ति से चले, तो दुर्घटना की कोई संभावना नहीं रहती। उस वाहन का चालक धर्म है।
भागवत ने बताया कि सृष्टि के निर्माण के साथ ही उसके संचालन के नियम बने और वही धर्म कहलाए। उन्होंने कहा कि पानी का धर्म बहना है, आग का धर्म जलाना है, उसी तरह पुत्र, शासक और समाज के हर वर्ग के अपने-अपने कर्तव्य होते हैं। हमारे पूर्वजों ने इन नियमों को गहन आध्यात्मिक शोध और साधना के माध्यम से समझा।
उन्होंने अहंकार से बचने की सलाह देते हुए एक कथा का उल्लेख किया, जिसमें एक कुम्हार का गधा मूर्ति ढोते समय यह मान बैठता है कि लोग उसे नमन कर रहे हैं। जब उसने सम्मान की अपेक्षा की, तो उसे दंड मिला। भागवत ने कहा कि अहंकार पवित्र कार्यों को भी बिगाड़ सकता है, इसलिए उससे मुक्त होना आवश्यक है।
आरएसएस प्रमुख ने कहा कि भारत ने समय-समय पर पूरी दुनिया को धर्म दिया है। धर्म केवल पुस्तकों या भाषणों में नहीं, बल्कि जीवन में अमल करने से जीवित रहता है। उन्होंने कहा कि धर्म सत्य पर आधारित है और जो लोग सत्य के साथ निरंतर जीवन जीते हैं, वही ऋषि होते हैं। ऐसे ऋषियों की रक्षा और गरिमा बनाए रखना समाज का कर्तव्य है।
आध्यात्मिक और भौतिक भूमिकाओं के संबंध पर प्रकाश डालते हुए भागवत ने कहा कि आध्यात्मिक लोग ही सच्चे नेता होते हैं और अन्य लोग उनकी रक्षा करने वाले होते हैं। उन्होंने कहा कि राज्य भले ही धर्मनिरपेक्ष हो, लेकिन कोई भी मानव या सृष्टि धर्म रहित नहीं हो सकती। अंत में उन्होंने सेवा कार्यों में लगे लोगों से ‘मैं’ की भावना त्यागकर ‘हम’ की भावना अपनाने का आह्वान किया। उन्होंने चेतावनी दी कि अच्छे कार्यों को बिगाड़ने की कोशिशें होंगी, लेकिन परिणाम की चिंता किए बिना नीयत के साथ लगातार अच्छा कार्य करते रहना चाहिए।
























