कम समय में रिकॉर्ड बनाने वाले बल्लेबाज का करियर तेजी से उतरा ढलान पर
नई दिल्ली,संवाददाता : भारतीय क्रिकेट ने कई महान खिलाड़ी दिए हैं, लेकिन कुछ कहानियां ऐसी होती हैं जो सफलता से ज्यादा सीख देती हैं। 1990 के दशक में एक ऐसा ही नाम उभरा, जिसने अपनी विस्फोटक बल्लेबाजी से पूरी दुनिया को चौंका दिया। यह कहानी है विनोद कांबली की—एक ऐसे बल्लेबाज की, जिनकी शुरुआत जितनी चमकदार थी, करियर का पतन उतना ही तेज रहा। आज, 18 जनवरी को विनोद कांबली अपना 54वां जन्मदिन मना रहे हैं।
शिवाजी पार्क से टीम इंडिया तक का सफर
मुंबई के प्रसिद्ध शिवाजी पार्क से निकले विनोद कांबली ने बचपन में ही क्रिकेट की दुनिया में अपनी अलग पहचान बना ली थी। उन्होंने उसी स्कूल और उसी कोच रमाकांत आचरेकर के मार्गदर्शन में क्रिकेट सीखा, जहां से सचिन तेंदुलकर भी निकले। स्कूल क्रिकेट में सचिन और कांबली की 664 रनों की ऐतिहासिक साझेदारी आज भी याद की जाती है। इस पारी में कांबली ने 349 रन नाबाद बनाए थे, जिसने उन्हें रातोंरात सुर्खियों में ला दिया। घरेलू क्रिकेट में शानदार प्रदर्शन के बाद कांबली को भारतीय टीम में मौका मिला और उन्होंने अपने शुरुआती टेस्ट मैचों में दोहरे शतक लगाकर चयनकर्ताओं का भरोसा जीत लिया।
भारत के लिए शानदार शुरुआत और रिकॉर्डतोड़ प्रदर्शन
विनोद कांबली का टेस्ट करियर आंकड़ों के लिहाज से बेहद प्रभावशाली रहा। उन्होंने अपने शुरुआती सात टेस्ट मैचों में 793 रन बनाए, जिसमें दो दोहरे शतक शामिल थे। उनका औसत 54 से अधिक रहा, जो किसी भी युवा बल्लेबाज के लिए असाधारण माना जाता है।
महज 14 टेस्ट पारियों में 1000 रन पूरे कर कांबली ने इतिहास रच दिया। वह उस समय भारत की ओर से टेस्ट क्रिकेट में सबसे तेज 1000 रन बनाने वाले बल्लेबाज बने। वनडे क्रिकेट में भी उन्होंने कई अहम पारियां खेलीं और एक समय उनका औसत कई दिग्गज बल्लेबाजों से बेहतर था। उस दौर में लगने लगा था कि भारतीय क्रिकेट को एक और सुपरस्टार मिल गया है।
अनुशासन की कमी और गिरता करियर ग्राफ
हालांकि, अपार प्रतिभा के बावजूद अनुशासन और निरंतरता की कमी कांबली के करियर पर भारी पड़ गई। शॉर्ट बॉल के खिलाफ कमजोरी, फिटनेस पर पर्याप्त ध्यान न देना और मैदान के बाहर का व्यवहार चयनकर्ताओं को खटकने लगा।
1996 विश्व कप के बाद उनका प्रदर्शन लगातार गिरता चला गया और टीम में उनकी जगह पर सवाल उठने लगे। कुछ भावनात्मक क्षणों और विवादित बयानों ने भी उनकी छवि को नुकसान पहुंचाया। नतीजतन, वह धीरे-धीरे अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट से बाहर होते चले गए।
क्रिकेट के बाद की जिंदगी और एक बड़ी सीख
क्रिकेट से बाहर होने के बाद विनोद कांबली ने फिल्मों, कमेंट्री और अन्य क्षेत्रों में हाथ आजमाया, लेकिन वह पहचान दोबारा हासिल नहीं कर सके। उनकी कहानी यह सिखाती है कि केवल प्रतिभा ही पर्याप्त नहीं होती—सफलता को बनाए रखने के लिए अनुशासन, धैर्य और सही मार्गदर्शन भी उतना ही जरूरी है। विनोद कांबली का उत्थान और पतन आज भी युवा खिलाड़ियों के लिए एक अहम सबक है कि सफलता पाना जितना कठिन है, उसे संभालना उससे भी ज्यादा चुनौतीपूर्ण होता है।
























