मेरिट से समझौता या नॉन-क्लीनिकल सीटें भरने की मजबूरी?
लखनऊ,संवाददाता : नीट पीजी 2025 के तहत एमडी, एमएस और डीएनबी पाठ्यक्रमों में प्रवेश के लिए कट-ऑफ में की गई भारी कटौती को लेकर प्रदेश के अनुभवी डॉक्टरों और चिकित्सा विशेषज्ञों के बीच तीखी बहस छिड़ गई है। एक वर्ग इसे स्नातकोत्तर चिकित्सा शिक्षा की गुणवत्ता पर सीधा हमला बता रहा है, तो वहीं दूसरे पक्ष का तर्क है कि नॉन-क्लीनिकल विषयों की खाली सीटें भरने के लिए यह फैसला आवश्यक था।
इस वर्ष सामान्य वर्ग के लिए कट-ऑफ को 50 पर्सेंटाइल से घटाकर 7 पर्सेंटाइल कर दिया गया है, जबकि ओबीसी, एससी-एसटी एवं अन्य वर्गों के लिए 40 पर्सेंटाइल से घटाकर शून्य और माइनस 40 पर्सेंटाइल तक कर दिया गया है। इस निर्णय ने चिकित्सा जगत में गहरा असंतोष पैदा कर दिया है। नेशनल यूनाइटेड फ्रंट ऑफ डॉक्टर्स के संस्थापक प्रो. (डॉ.) अनिल नौसरान ने इस फैसले को खतरनाक बताते हुए कहा कि चिकित्सा शिक्षा में मेरिट से समझौता देश के स्वास्थ्य तंत्र के लिए घातक साबित हो सकता है। उनके अनुसार, चिकित्सा कोई सामान्य शिक्षा नहीं है और यहां तैयार होने वाले विशेषज्ञ सीधे मानव जीवन से जुड़े होते हैं। इतनी कम कट-ऑफ भविष्य में अयोग्य विशेषज्ञों की पीढ़ी तैयार करने का जोखिम पैदा करती है।
वहीं, केजीएमयू के पूर्व शिक्षक और हिंद मेडिकल कॉलेज के प्रवक्ता डॉ. नरसिंह वर्मा ने कट-ऑफ में कटौती का बचाव करते हुए कहा कि यह मुख्य रूप से नॉन-क्लीनिकल विषयों की सीटों के लिए की गई है। निजी मेडिकल कॉलेजों में इन विषयों की फीस अधिक होने के कारण सीटें खाली रह जाती हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि जीरो पर्सेंटाइल का अर्थ माइनस अंक नहीं है और सभी अभ्यर्थी एमबीबीएस उत्तीर्ण हैं, इसलिए योग्यता पर सीधा असर नहीं पड़ेगा।
बरेली के वरिष्ठ बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. अतुल अग्रवाल ने नीति पर सवाल उठाते हुए कहा कि पर्सेंटाइल की जगह न्यूनतम प्रतिशत तय किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि निजी मेडिकल कॉलेजों में अत्यधिक शुल्क, बांड की शर्तें और प्रमाणपत्र रोके जाने जैसी वजहों से सीटें खाली रहती हैं। ऐसे में मानक गिराने के बजाय सीटें खाली रहने देना बेहतर विकल्प है। उनका कहना है कि इस फैसले का सबसे अधिक लाभ उन निजी कॉलेजों को मिलेगा, जहां न मरीजों की पर्याप्त संख्या है और न ही गुणवत्तापूर्ण शिक्षा व्यवस्था।
एरा मेडिकल कॉलेज के कुलपति प्रो. अब्बास अली मेहंदी ने कट-ऑफ में कमी को व्यावहारिक कदम बताया। उन्होंने कहा कि पीजी की कुल सीटों में करीब 30 से 40 प्रतिशत सीटें नॉन-क्लीनिकल विषयों की होती हैं, जो हर साल बड़ी संख्या में खाली रह जाती हैं। इन सीटों के खाली रहने से मेडिकल कॉलेजों में फैकल्टी और शैक्षणिक स्टाफ की कमी बनी रहती है। कट-ऑफ घटने से आवश्यक शिक्षक उपलब्ध हो सकेंगे और शैक्षणिक कार्य प्रभावित नहीं होगा।
मुख्य बिंदु
• जनरल वर्ग: कट-ऑफ 50 से घटकर 7 पर्सेंटाइल
• ओबीसी/एससी-एसटी: 40 से घटकर 0 व माइनस 40 पर्सेंटाइल
• डॉक्टरों में गुणवत्ता बनाम सीट भरने को लेकर मतभेद
• नॉन-क्लीनिकल सीटें खाली रहना बड़ी वजह
• फैसले पर देशभर में बहस तेज























